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GOLDEN TEMPLE ( HOLIEST SHRINE IN SIKHISM BUT WELCOMES ALL )
अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर, जिसे श्री हरमंदिर साहिब भी कहा जाता,अपनी अद्भुत स्वर्ण-लेपित वास्तुकला, आध्यात्मिक महत्व के लिए हे प्रख्यात,
सिख धर्म का आध्यात्मिक केंद्र, चौबीस कैरेट एकदम शुद्ध सोने तुल्य से ढकी एक केंद्रीय संरचना है, और सभी पृष्ठभूमि के लोगों का करता स्वागत
यह मंदिर एक कृत्रिम तालाब से घिरा हुआ है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें उपचार करने की शक्ति हे अमृत सरोवर,
सबसे बड़ी मुफ्त सामुदायिक रसोई में से एक का संचालन कर, प्रतिदिन हजारों लोगों को पंगत में बिठाकर भोजन खिलाकर चलता लंगर
सिख धर्म का सबसे पवित्र तीर्थस्थल मंदिर मानवता, समानता, शांति का प्रतीक, इसके चार प्रवेश द्वार सभी के लिए हे खुला, यह दर्शाता
यह शहर अपना इतिहास , भारत-पाक सीमा पर वाघा बॉर्डर की परेड, अमृतसरी कुलचा, लस्सी जैसे लजीज व्यंजन वास्ते अपनी और खींचता
"गुरु ग्रंथ साहिब" लिए हुए 1588 में गुरु अर्जन देव जी द्वारा निर्मित, महाराजा रणजीत सिंह ने 1830 में सोने की परतों से की इसकी सजावट,
हिंदू और इस्लामिक वास्तुकला की मिश्रित शैली, गुंबद, मेहराब और पच्चीकारी का काम प्रमुख, एक सड़सठ फुट चौकोर प्लेटफॉर्म पर की गयी बनावट
BADRINATH TEMPLE ( RENOWED FOR GARHWALI ARCHITECTURE & STONE IDOL OF BADRI )
अलकनंदा नदी पर चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ मंदिर, भगवान विष्णु को समर्पित उनकी 3.3 फुट ऊंची प्रतिमा विराजमान, हिस्सा छोटा चार धाम,
इसकी मान्यता इतनी हे कि यात्रा चरम होने पर वाहनों की लंबी कतार के कारण, या कपाट बंद होने के समय ( नवंबर ) में लग जाता लंबा भीषण जाम
गढ़वाल हिमालय में, वैष्णवों के 108 दिव्य देशमों में से एक, केवल गर्म महीनों में ही पहुँच संभव, बर्फीली चोटियों से घिरा रहता,
वर्तमान संरचना रंग-बिरंगी, जो बौद्ध विहार जैसी दिखती हे, भारी बर्फबारी के कारण देवता की प्रतिमा को स्थानांतरित कर दिया जाता
इसमें तपकुंड और नारदकुंड नामक प्राकृतिक गर्म पानी के झरने हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उनमें हे शुद्धिकरण और औषधीय गुण,
हिमस्खलन, भूकंप और हिमालय की कठोर जलवायु के कारण हुए विनाश के चलते इसका इतिहास में कई बार हुआ हे पुनर्निर्माण
भयंकर मौसम से सुरक्षित रहने के देवी लक्ष्मी ने स्वयं को बद्री (बेर का पेड़ ) में रूपांतरित कर लिया, जिससे इस स्थान का नाम " बद्रीनाथ " पड़ा,
3,100 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित होने के चलते इसकी चढ़ाई में थकावट कम करने और सांस लेने में आसानी हेतु जरुरी हे रहना सीधा खड़ा
AKSHARDHAM TEMPLE ( HAS PRESERVED HINDU CULTURAL HERITAGE )
अक्षरधाम मंदिर एक विशाल, आधुनिक हिंदू मंदिर परिसर हे, पारंपरिक भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और वास्तुकला का है उत्कृष्ट उदाहरण,
वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, नर्तकियों और देवी-देवताओं की जटिल नक्काशी, पूरी तरह से बलुआ पत्थर और संगमरमर से किया गया हे इसका निर्माण
"अक्षरधाम" का अर्थ है ईश्वर का दिव्य निवास जो परिसर हे भक्ति, ज्ञान और सद्भाव की तरफ प्रतिबद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक, दिल्ली में स्तिथ दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर होने के लिए गिनीज बुक रिकॉर्ड का हे एक गौरवपूर्ण धारक, जिसमे होते जल शो आकर्षक
भक्ति, ज्ञान और सद्भाव को समर्पित एक आध्यात्मिक परिसर मुख्य आकर्षणों में मुख्य मंदिर, प्रदर्शनियाँ, संगीतमय जल प्रदर्शन और विशाल उद्यान,
इसमें 1,152 स्तंभों और 145 खिड़कियों वाली दो मंजिला इमारत हे ऐवम लाल पत्थरों से बना 3,000 फीट लंबा परिक्रमा पथ है जो लाये गए राजस्थान
जयपुर का सफेद मार्बल से बना जिसमे एक बड़ा रसोईघर, एक रेस्तरां और खेलने की जगह है, भी हे भगवान नारायण को समर्पित,
इसकी मूर्तियां, उत्कीर्णन जो हे बेहद शानदार मनमोहक वास्तुकला के साथ रात में प्रभावशाली प्रकाश व्यवस्था के कारण और भी हो उठती जीवंत
BRIHADEESWARAR TEMPLE ( DEDICATED TO SHIVA )
तंजावुर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर, भगवान शिव को समर्पित एक प्रमुख ग्यारहवीं शताब्दी का स्थल है जो साथ में हे यूनेस्को विश्व धरोहर,
राजाराजा चोल प्रथम द्वारा निर्मित, 1010 ईस्वी में पूरा हुआ, द्रविड़ वास्तुकला का यह उत्कृष्ट नूमना, सीमेंट के ग्रेनाइट संरचना के लिए मशहूर
तेरह मंजिला दक्षिण भारत की सबसे ऊंची मीनारों में से एक,जिसमे विशाल स्तंभों वाला प्राकार (गलियारा), हे हजार वर्ष से ज्यादा पुरातन,
जाना जाता इसे " तंजावुर बिग टेंपल " या राजराजेश्वरम, मंदिर की परकोटा पर तमिल शिलालेख खुदे हुए , जिनमें शाही दान का भी हे वर्णन
दोपहर के समय मुख्य विमान की छाया कभी जमीन पर नहीं पड़ती, शीर्ष संरचना आग्नेय चट्टान के एक ही शिलाखंड से गई है तराशी,
शिव के विभिन्न रूपों का चित्रण है, जिनमें अर्धनारीश्वर, नटराज, कालान्तक (काल का अंत करने वाले), और गंगाधर शामिल हैं की हे नक्काशी
प्रवेश पर भारत की दूसरी सबसे बड़ी नंदी प्रतिमा हे, गर्भगृह में 8.7 मीटर ऊंचा विशाल शिवलिंग, दीवारों पर नृत्य की इक्यासी मुद्राएं हे अंकित
पूरी तरह से ग्रेनाइट से बना हुआ, बिना पास में खदान के लाया गया, अभी तक हे शोध का विषय, जिसमे शिखर पर अस्सी टन भार स्थापित
VAISHNO DEVI TEMPLE ( BELIEVED THAT FULFILLS WHATEVER HER DEVOTEES WISH FOR )
जम्मू कश्मीर में वैष्णो देवी ( दुर्गा का एक अवतार ) को समर्पित, एक प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थल है, जिसे खासकर नवरात्रि में लोग पसंद करते चढ़ना,
चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है, प्रेम से बोलो, जय माता दी, जैसे जयकारे से आसान हो जाता तेरह किलोमीटर के थोड़े दुर्गम रास्ता पर बढ़ना
यहां एक पवित्र गुफा है जिसमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का प्रतिनिधित्व करने वाली हैं तीन पिंडियां,
इसके स्थानीय मंदिर के पास जैसे अहमदाबाद, कोटा में आयोजित होते लाइव संगीत के साथ पेन गरबा नाइट्स या डांडिया
माता रानी सभी मनोकामनाएं पूरी करती, एक सौ आठ शक्ति पीठों में से एक माने जाने वाला, कटरा से होती शुरुआत,
वैष्णवी भगवान विष्णु की परम भक्त , राक्षस भैरव को पराजित करने के बाद मानव रूप धारण किया, और विलीन हो गयी पर्वत
निःशुल्क पंजीकरण ( यात्रा पर्ची ) अनिवार्य जिसे ऑनलाइन भी प्राप्त कर सकते, इसमें हे तीन मुख्य स्टॉप बंगंगा,चरण पादुका, अर्द्धकुवारी,
चाहे पैदल चलकर जाये या घोड़ों / पालकी, हेलीकाप्टर से पूरी करे, ऐसी मान्यता हे कि भैरवनाथ के दर्शन के बिना आपकी यात्रा हे अधूरी
KEDARNATH TEMPLE ( FEATURES ANCIENT GRAY STONE ARCHITECTURE )
केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में हे एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल, बारह सौ साल से ज्यादा पुराना स्तिथ 3,586 मीटर आरोहण,
पौराणिक कथा किंवदंती अनुसार पांडवों ने भगवान शिव से क्षमा मांगने के लिए इसको बनवाया था, जो रूप में प्रकट हुए थे चट्टान त्रिकोण
बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों से घिरा हुआ, यहाँ पर एक शिलालिंग स्थापित जो विख्यात हे अद्वितीय शंकु के आकार,
चरम मौसम का सामना करने हेतु ,बड़े-बड़े पत्थर के शिलाखंडों का उपयोग किया हे आपस में एक दूसरे को जोड़कर
गौरीकुंड से लगभग सत्रह किलोमीटर दूर शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों का मुख्य स्थान , सबसे कठिन चार धाम ट्रेक पर हे बेहद ही महत्वपूर्ण
विनाशकारी बाढ़ के दौरान भीम शिला ने बहते पानी और मलबे का रास्ता बदलकर, मंदिर के लिए ढाल का काम किया, जो हे अजूबा विलक्षण
शंकरजी ने ब्रह्मा का दिव्य रूप धारण कर ब्रह्मांड की रचना की शुरुआत यही से की, अतः उनका प्रिय स्थान होने के कारण यह समान हे देवलोक,
मई (अक्षय तृतीया) से अक्टूबर/नवंबर (दिवाली) तक तीर्थयात्रियों के लिए खुला रहता, परन्तु सर्दियों में सुरक्षा को खतरा होने के चलते दर्शन पर हे रोक